आत्म साक्षात्कार

नारी का कविता ब्लॉग © 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!अब खुले वातायनो से सुखद, मन्द, सुरभित पवन के मादक झोंके नहीं आते,अंतर्मन की कालिमा उसमें मिल उसे प्रदूषित कर जाती है। अब नयनों से विशुद्ध करुणा जनित पवित्र जल की निर्मल धारा नहीं बहती,पुण्य सलिला गंगा की तरह उसमें भी घृणा के... [पूरी पोस्ट]
writer Sadhana Vaid
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[04 May 2010 04:00 AM]

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