शर्म और प्रेम

स्वार्थ साँस उखड़ती जाती है पलकें झुकती जाती हैं गाल सुर्ख़ हुए जाते हैं ऊँगलियाँ खेलती जाती हैं बालों की घुंघराली लटों से पैर क़ुरेदते जाते हैं ज़मीन को पर लबों की हिमाकत तो देखिए कहे चले जाते हैं अभी भी हमें उनकी परवाह नहीं!... [पूरी पोस्ट]
writer swaarth

poetryLoveप्रेमशर्म

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[03 May 2010 23:42 PM]

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