"सुमन हमें सिखलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)
“शिक्षाप्रद बाल-कविता”काँटों में पलना जिनकी,किस्मत का लेखा है।फिर भी उनको खिलते, मुस्काते हमने देखा है।।कड़ी घूप हो सरदी या, बारिस से मौसम गीला हो।पर गुलाब हँसता ही रहता,चाहे काला, पीला हो।। ये उपवन में हँसकर,भँवरों के मन को बहलाते हैं।दुख में कभी न...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
बालकविता
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[03 May 2010 22:01 PM]



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