हवा के दोश पर बादल के टुकड़े की तरह हम हैं...!
बिखरते टूटते लम्हों को अपना हमसफ़र जानाथा इस राह में आखिर हमें ख़ुद ही बिखर जानाहवा के दोश पर बादल के टुकड़े की तरह हम हैंकिसी झोंके से पूछेंगे कि है हमको किधर जानामेरे जलते हुए घर की निशानी बस यही होगीजहाँ इस शहर में तुम रोशनी देखो ठहर जानापस-ए-ज़ुल्मत कोई...
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Dr. Chandra Kumar Jain
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[03 May 2010 11:51 AM]



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