सर्मपण से होता है दुखों का अन्त Submission to God
मनुष्य का मार्ग और धर्मपालनहार प्रभु ने मनुष्य की रचना दुख भोगने के लिए नहीं की है। दुख तो मनुष्य तब भोगता है जब वह ‘मार्ग’ से विचलित हो जाता है। मार्ग पर चलना ही मनुष्य का कर्तव्य और धर्म है। मार्ग से हटना अज्ञान और अधर्म है जो सारे दूखों का मूल है।...
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DR. ANWER JAMAL
पाप
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[03 May 2010 11:05 AM]



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