॥ आकाश में आगामारी पंछी॥
(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : सोलह)देखो जरा, आकाश में आगामारी पंछीकैसे उड़ रहे हैं कतार मेंउनके डैनों के छोर परगोया चमचमा रही हैं चांदी की झालरें।और देखो, वर्षा को निमंत्रण देनेवालेचील और हेडे पंछी भीकैसे उलट-पुलट कर उड़ रहे हैंजिनके गले में सुशोभित है...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[03 May 2010 11:05 AM]



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