एक चुप

बिखरे  मोती शोखियाँ   जो बोलीं वो भी  बेबसी ही थी , उदासी भी थी कुछ ज़मीं के  फासलों  से , यूँ तो था नहीं  कोई  दरम्याँ    हमारे, बस एक चुप थी  जो मन को  बहुत सालती थी....... [पूरी पोस्ट]
writer sangeeta swarup
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[03 May 2010 09:00 AM]

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