मजदूरों का बंधुआ बनना जारी है...
देवाशीष प्रसून का यह लेख कल के जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था. विकास और सामाजिक उन्नति के बेशर्म और झूठे दावों के बीच जमीन पर वास्तविक हालत क्या है, इसे प्रसून ने दिखाने की कोशिश की है.अगर भारत सरकार या देश के किसी भी राज्य सरकार से पूछा जाये कि क्या अब भी...
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Reyaz-ul-haque
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[03 May 2010 07:35 AM]



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