ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!(एक विचार...., )
ना तो लेखनी में समर्पण है,ना सही है कभी आह कोई,क्या लिख पाऊंगा मै,खुद के लिए,औरो के लिए!बहा चला गया हर बार बहाव के साथ मै,बह गया गया कभी भाव के साथ,खींच-तान रही जारी सदा लगाव के साथ,रहा लुटता हर बार चुनाव के साथ!क्या उलझन ही जीवन है,या पकड़ ली है गलत...
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kunwarji's
(कविता)
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[03 May 2010 05:17 AM]



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