इस तरह दिल की लगी अपनी बुझाता है
इस तरह दिल की लगी अपनी बुझाता हैदिल्लगी के वास्ते मुझको बुलाता हैपैर रख काँधों पे वो ऊँचा उठा कितनाशौक़ से ख़ुद दास्ताँ अपनी सुनाता हैअजनबी हूँ शहर में किस ओर मैं जाऊँ जिससे पूछो वो अलग रस्ता बताता हैमिल न पाया जो कभी ख़ुद से न दुनिया सेरोज ही भगवान से सबको...
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प्रताप नारायण सिंह
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[03 May 2010 04:47 AM]



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