ऋतु बसंत की मादक बेला, तुझ बिन सूनी ओ हरजाई
ऋतु बसंत की मादक बेला तुझ बिन सूनी ओ हरजाई मन का दर्पण बिखरा-बिखराजैसे अम्बर की तन्हाई... कंगन, पायल, झूमर, झांझर सांझ सुहानी, नदी किनाराआकुल, आतुर विरह, व्यथित मनपंथ प्रिय का देख के हाराकल की यादें बांह में ले के मुझको सता रही अमराई...क्षण, रैना, दिन सब...
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फ़िरदौस ख़ान
गीत
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[03 May 2010 04:48 AM]



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