जरा सा गुनगुनाया हूँ
लिखे हैं गीत मैने भावना को शब्द में बोकरलिखे हैं अस्मिता को हर सिरजते छन्द में खोकरलिखे हैं कल्पना के पक्षियों के पंख पर मैनेलिखे हैं वेदना की गठरियों को शीश पर ढोकरमगर जो आज लिखता हूँ नहीं है गीत वह मेरातुम्हारी प्रीत को बस शब्द में मैं ढाल लाया हूँरंगा...
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राकेश खंडेलवाल
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[02 May 2010 22:20 PM]



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