लाज न आवत आपको
एकालापलाज न आवत आपको तुम्हें चबाने को हड्डी चाहिए थीखाने को गर्म गोश्तचाटने को गोरी चमड़ीचाकरी को सेविकाऔर साथ सोने को रमणी.तुमने मुझे नहींमेरी देह को चाहा.पर मैं देह होकर भीदेह भर नहीं थी.मैं औरत थी!मुझे लोकलाज थी!तरसती थी मैं भी - तुम्हारे संग...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
कविता
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[02 May 2010 19:52 PM]



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