कागज की कश्ती

जज़्बात, ज़िन्दगी और मै चलिए हंसी मजाक हो गया, अब फिर से संजीदा कुछ हो जाये - कर लो चाहे कुछ भी पर ये यार नहीं कर पाओगे ।कागज की कश्ती से सागर पार नहीं कर पाओगे ॥पी कर आंसुओं को मैंने, छाती पर पत्थर रखकर ।किया है जिस तरह इंतज़ार नहीं कर पाओगे ॥लेकर नाम उनका तुमने पुकारा है... [पूरी पोस्ट]
writer Indranil Bhattacharjee ........."सैल"

ghazal

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[02 May 2010 10:53 AM]

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