मगर आईने सारे धुंधले हुए

bat-bebat अचानक शहरयार साहब के कलाम से नये सिरे से रूबरू होने का मौका मिला। समकालीन उर्दू शायरी में शहरयार एक बड़ा नाम हैं। हिंदी पाठकों में भी उनकी मुकम्मल पहचान है। वे अपनी शायरी में सामाजिक विसंगतियों को तो उभारते ही हैं, एक नये समाज का ख्वाब भी देखते हैं।... [पूरी पोस्ट]
writer डा.सुभाष राय
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[02 May 2010 09:42 AM]

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