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RAVINDRA GOYAL पत्ते सूखे जाते हैं बादल ना अब गरजाते हैं बेटी की शादी, मुन्ने की पढाई घर का खर्चा, गेहूं की पिसाई पेट्रोल की क़ीमत, छत पे दीमकजेबें खाली, हर चीज़ की किल्लत परेशान सब नज़र आते हैं इतने पर भी हंसते गाते बिज़लरी की बोतल लिए हाथ मेंबडी बडी गाडी से उतरकर... [पूरी पोस्ट]
writer रवीन्द्र गोयल्

उद्योग

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[02 May 2010 09:14 AM]

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