कुटज तरू सा मेरा मन
मरू भूमि सी ऊष्णकठोर जिन्दगी कीविषम परिस्थितियों सेटकराता, गिरता पड़ताचोटिल होता मेरा मन.शिव की जटा-जूट सासूखा, नीरसशिवालिक बनाये मेरा मन.कुटज तरु की भांतिफिर भी सदैवमुस्कराने को तैयारये मेरा मन.अलमस्त, अटखेलियाँ करताअंतस में फैले अवसाद परकफ़न चढ़ाता...
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अनामिका की सदाये......
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[02 May 2010 08:55 AM]



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