कोई ई-मेल,कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं.
ग़ज़लनींद रातों की मेरी रोज़ उड़ाने वाले.खो गये जाने कहाँ दिल को लुभाने वाले.कोई ई-मेल, कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं,याद आते हैं बहुत हमको भुलाने वाले.दिल भी वो ले गये चुपके से चुरा कर इक दिन,मेरे बचपन में खिलौनों को चुराने वाले.जान लेवा ये तपिश, उस पे...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[02 May 2010 06:39 AM]



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