जनाब सरवर की एक गज़ल : बयान-ए-हुस्न-ओ-शबाब
ग़ज़ल :बयान-ए-हुस्न..... बयान-ए-हुस्न-ओ-शबाब होगा तो फिर न क्यों इज़्तिराब होगा ? ख़बर न थी अपनी जुस्तजू में हिजाब-अन्दर-हिजाब होगा ! कहा करे मुझको लाख दुनिया सुकूत मेरा जवाब होगा किसे ख़बर थी दम-ए-शिकायत वो इस तरह आब-आब होगा ? मैं ख़ुद में रह रह कर झाँकता...
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आनन्द पाठक
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[02 May 2010 02:39 AM]



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