व्यंग्य-संतई का संभावनापूर्ण रास्ता
//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट// इन दिनों झूर के संत बनने का मन कर रहा है। क्या मजे है संतों के! बड़े-बड़े वातानुकूलित आश्रम, बड़ी-बड़ी लक्झरी गाड़ियाँ, धन-दौलत, सुख-समृद्धि, आनंद-मंगल सभी कुछ! सबसे बड़ी बात दर्जनों भक्तिनों का प्रेम-भक्तिभाव, ऐसा स्वर्णिम अवसर भला...
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vyangya
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[02 May 2010 01:24 AM]



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