कपोल-लली
खिलने में हो लावण्य भंगदिखने में सबको लगे भली.पिय दर्शन से रतनार रंगहो जाता कनक-कपोल-लली*.नत नयन मंद मुस्कानों की अवगुंठन की कहलाति अली**.पुरषों के भ्रमर-लोचनों को लगती रसदार कपोल-कली.*कपोल-लली — लज्जा.**अली — सखी....
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Pratul
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[18 Feb 2010 21:51 PM]



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