खोखली धारणा
जिसके अर्चन में दिवस रात रहती थीं निज आँखें सनाथ.जिसके आँचल में बैठ मुझे मिलता था ईहित प्यार-मात.जिसके दर्शन से नयन धन्य समझा करता खोले कपाट.जिसके चलने पर ऊंच-नीच पथ को करता था मैं सपाट.जिसके नर्तन पर कभी-कभी कवि उर में आ जाता भूचाल.कविता बेचारी इधर-उधर...
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Pratul
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[21 Feb 2010 22:41 PM]



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