अर्चना!

दर्शन-प्राशन अर्चन करती आँखें तेरीसृजन करती कविता मेरी होवेगी नूतन उत्पत्तिमेरे ही हाथों से तेरी.नर्तन करती बाहें तेरीसुर देती आवाजें मेरीतुम ही हो मेरी संपत्तितुम ही हो मेरी कमजोरी.तुझमे मुझमे कितनी दूरीफिर भी मिलती श्वासें पूरीतुम बिन मिलकर मिल जाती होतुम हो किस... [पूरी पोस्ट]
writer Pratul
views
4
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[17 Mar 2010 03:27 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix