विचित्र बात

दर्शन-प्राशन हे अज्ञातयौवना !मैं बन गया महात्मा. पर छूटते ही जा रहे, किस ओर से ये बाण हैं. कितनी विचित्र बात है, कितनी विचित्र बात है.इधर तुणीर रिक्त है.उस ओर का भी रिक्त है.पर क्या चला, किसको लगा और कब चला, किस पर चला?— यह पूछने की बात है.इसमें किसी का हाथ है.या... [पूरी पोस्ट]
writer Pratul
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[03 Apr 2010 21:34 PM]

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