स्वीकार
मुझसे तुम घृणा करो चाहे चाहे अपशब्द कहो जितनेमैं मौन रहूँ, स्वीकार करूँ.तुम दो जो तुमसे सके बने.मुझपर तो श्रद्धा बची शेष. बदले में करता वही पेश. छोडो अथवा स्वीकार करो.चाहे अपनत्व का करो लेश....
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Pratul
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[07 Apr 2010 01:36 AM]



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