उडाओ ना समीर में रेत

दर्शन-प्राशन अरी! तू सुन्दरता में छिपी, छ्लेगी कब तक ऐसे ही.कभी ना कभी दिखेगा रूप, आपका अन्दर वाला भी.करी तुमने मर्यादा भंग, किया छल अपनों के ही संग. छेड़खानी समीर के साथ करी तुमने होकर के नंग. केश उपमेय गगन की घटा, चली आई क्यों केश कटा. जिसे सहलाया करता पवन, उसे... [पूरी पोस्ट]
writer Pratul
views
7
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[24 Apr 2010 01:34 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix