दो शब्द
प्रारम्भ से ही मेरी इच्छा कम बोलने वाले और चुपचाप रहने वाले साथियों से संवाद की रही। धीरे-धीरे यही इच्छा संकोचवश कविता लेखन के दौरान काल्पनिक कथोपकथन के रूप में विकसित हो चली। इसके बाद अर्थोपार्जन के समय व्यावसायिक अनवरतता न रहने से, रुचि व योग्यतानुरूप...
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प्रतुल कहानीवाला
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[27 Mar 2010 00:59 AM]



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