मजदूर दिवस पर!

दिल से एक मजदूर सपने भी शर्माते हैं उसकी आँखों में आने से, आ भी जाते हैं कभी भूले भटके तो बह जाते हैं उसके पसीने में और कभी बूंदें बनकर टपकते हैं उसकी आँखों से, छोटे छोटे ही तो होते हैं सपने उसके बीमार माँ कि दवा के सपने चूल्हे में लकड़ी के सपने बेटे कि पढाई के... [पूरी पोस्ट]
writer nilesh mathur
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[01 May 2010 12:55 PM]

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