अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-5-----(विनोद कुमार पांडेय)

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने ग्रह,नक्षत्र अनुकूल हो,मंदिर जाते रोज|घर में माँ भूखी रहे,बाँट रहे वो भोज||सब अपने में लीन है,अजब -गजब हालात|ऐसे तैसे काटते,बाबू जी दिन रात||बस रोटी दो जून की, हिस्से दादी के |कंप्यूटर ने छीन ली,किस्से दादी के||नाती पोते समझते,हैं उनको अब भार| | अंधे... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
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[01 May 2010 11:00 AM]

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