पर
बारिश से भीगीउस शाम कोदेखा थाबुर्क़े के भीतरकॉरसेट पहने उसबुर्क़ानशीं कोऔर जाने किस आलम मेंआगे बढ़करछोटी-सी बिन्दी लगा दी थीउस शफ़्फ़ाफ़ चेहरे परवो स्तब्धदेखती ही रहीऔर चली गईफिर मिलने का वादा करके(अगले दिन)-वो ही शाम थी-वो ही बारिश-वो ही...
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Amitraghat
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[01 May 2010 10:29 AM]



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