मात्र एक डोर
कल्पना की पतंग सोच की डोर से बाँधउड़ा दी थी मैंनेअनंत में | पर तुम्हारीसोच के मांझे नेकाट दी थीमेरी डोरधराशायी होते हुएपतंग मेरीअटक गयी थीसमाज रुपीबिजली के तारों में ...
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sangeeta swarup
कविता ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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[01 May 2010 09:12 AM]



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