सोचकर तो देखें

feminist poems कभी सोचते हैं हमफाइव-स्टार होटलों मेंछप्पन-भोग खाने से पहलेकि कितने ही लोगएक जून रोटी के बगैरतड़प-तड़प के मरते हैं ।कभी सोचते हैं हमआलीशान मालों मेंकीमती कपड़े खरीदने से पहलेकि कितने बच्चे और बूढेफटे -चीथड़े लपेटेगर्मी में झुलसतेसर्दी में ठिठुरते हैं... [पूरी पोस्ट]
writer mukti
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[01 May 2010 05:44 AM]

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