दो चार दिनों के लिए मर नही सकते...!
आज से तीन साल पहले का मंजर याद आता है... खुद पर तरस आता है... ये स्वयं पर विश्वास का ही असर है की बहुत से झंझावातों को झेलते हुए एक अकेला युवक महानगर में अपनी राह बनाता हुआ स्वयं को भीड़ में खड़ा होने लायक बनाता है.... साहित्य प्रेम ऐसा की तंग हालात में...
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सुलभ § सतरंगी
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[01 May 2010 05:15 AM]



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