ट्वीट-ट्वीट नहीं स्वीट-स्वीट

तिश्नगी जमाना कहां से कहां पहुंच गया है। कभी एक जगह से दूसरी जगह बात पहुंचाने में महीनों लगते थे। संवाद पहुंचाने का काम पलक झपकते ही पूरा हो जा रहा है। कबूतर और संवदिया तो अब किताबों तक सिमट कर रह गए हैं। चिट्ठी लिखने वालों को कोई पूछता तक नहीं। सूचना क्रांति के... [पूरी पोस्ट]
writer अखिलेश चंद्र
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[01 May 2010 05:26 AM]

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