पिता

9th Dimension's Base चिरसहिष्णुता की वेदी पर, पुष्प बन कर चढ़ जाने को आज जीवित हूँ मैं, पिता की धूमिल छवि सुनाने कोशांत ह्रदय के दीप्त भाल का, फिर से मंद-मंद मुस्काने को प्रयत्न मात्र है,पित्री भाव की बलिहारी का; इस तुक्ष मुख से, आज कह जाने को अनुशासन, तेज है मुख... [पूरी पोस्ट]
writer Vishal Kashyap
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[30 Apr 2010 16:46 PM]

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