थाम के मेरा हाथ
बस ऐसे ही कुछ सोचा... कहीं पे एक चित्र देखा तो मन मे बस ये ही बोल उठ पड़े... शायद एक स्त्री जो अपने प्रेम के लिए किसी भी हद तक जा सकती है किसी भी परेशानी का सामना कर सकती है... उसी के नाम मेरी ये रचना.. कभी किन्ही अनजानी राहों पे,कभी ऊँची नीची...
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हिमांशु पन्त
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[30 Apr 2010 16:17 PM]



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