जीने की ललक अभी बाकी है
आशा जी ने नारी ब्लॉग पर कमेन्ट दिया था वहाँ से मे उनके ब्लॉग तक गयी और इस कविता को पढ़ा आप भी पढेस्वत्व पर मेरे पर्दा डाला ,मुझको अपने जैसा ढाला ,बातों ही बातों में मेरा ,मन बहलाना चाहा ,स्वावलम्बी ना होने दिया ,अपने ढंग से जीने न दिया |तुमने जो खुशी...
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[30 Apr 2010 12:30 PM]



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