अर्ज़ है . . .
बस इतनी अर्ज़ हमारी है!ज़हनों से हटे झुर्री ना सही पर मन तो बच्चा हो जाए जंगल पे नहीं दावा हमको इक पेड तो सच्चा हो जाए ये सोच के नाटक करते हैंशायद कुछ अच्छा हो जाए अब चेहरा बदलो या शीशाये आपकी ज़िम्मेदारी हैअच्छा सोचो, अच्छा बोलोबस इतनी अर्ज़ हमारी है।...
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रवीन्द्र गोयल्
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[14 Apr 2010 07:04 AM]



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