तुम थी . . .
कभी देखा है ?बादल को जाते, पानी की तलाश मेंसहरा को तड़पते, गर्मी की आस मेवृक्ष को खड़े, मुसाफिर की राह मेंया फिर मंजिल से दूरकिसी मोड़ पर खड़े राहगीर कोएक साथी की तलाश मेंसभी हैं इंतज़ार में, एक हमसफ़र कीजो साथ चले , चलता जाएऔर दूर क्षितिज को पा जाएहम भी...
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रवीन्द्र गोयल्
रविन्द्र गोयल
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[28 Apr 2010 01:11 AM]



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