चला जा रहा था

RAVINDRA GOYAL चला जा रहा थाज़िन्दगी की इस दौड मेंचिलचिलाती धूप मेंबेरंग और बेरूप मैं बस चला ही तो जा रहा था तभी नज़र आई उमडती हुई सी सावन की बदलीकभी चमकतीकभी फडकतीपल-पल दमकती जैसे हो बिजली घटाओं के पीछे हवाएं कह रही हैं सुकूं अब मिलेगा उम्मीद दे रही हैं कल की खुशियां कल... [पूरी पोस्ट]
writer रवीन्द्र गोयल्

जेबीकम्युनिकेशन

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[28 Apr 2010 01:10 AM]

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