पाखी

RAVINDRA GOYAL जब नदी किनारे बैठा कोईअंतर्मन को खोजे फंसा कोई हो अंतर्द्वन्द में, राह ना कोई सूझे तने भवें, चेहरा गुस्से से लाल तमतमा जाएमुट्ठी भींचे, दांत पीसकरसूरज को घूरे जाएजब हो हताश, वो हो निराश और दिल घबरा जाए वो हो बेचैन, मन व्याकुल हो पर राह नज़र ना आएतब चुपके... [पूरी पोस्ट]
writer रवीन्द्र गोयल्

सच कम्युनिकेशन

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[28 Apr 2010 01:07 AM]

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