उम्र खप जाती है छोटी-सी किसी ईजाद में!
मैं थोड़ी देर जिससे सर टिकाकर बैठ लेता हूंवो पत्थर की नहीं, उम्मीद की दीवार है कोई।न इसकी थाह है कोई, न इसका पार है कोईये दुनिया है अजब इसका न पारावार है कोई।मैं चाहूँ तो भी मुझको चैन से रहने नहीं देगामेरे भीतर अगर ज़िंदा कहीं फ़नकार है कोई।यहाँ पर आत्मा...
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दीपक गर्ग
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[30 Apr 2010 11:31 AM]



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