दादा जी! जरा अपने पोते पोतियों के दोस्त तो बनें!

अनवरत श्री विष्णु बैरागी जी के ब्लाग एकोऽहम् पर कुछ दिन पहले एक पोस्ट थी  'वृद्धाश्रम: मकान या मानसिकता। मैं ने इस पर टिप्पणी की थी "काका साहब बेटे बहू और पोते पोती के दोस्त क्यों नहीं बन जाते हैं? क्यों दादा ही बने रहना चाहते हैं? मेरे पिता जी के काका जी... [पूरी पोस्ट]
writer दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

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[30 Apr 2010 09:20 AM]

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