जन्म एक कविता का...
जबड़े कस जाते हैं मुट्ठी भिंच जाती है माथे पर असंख्य सिकुड़नें तैर जाती हैं शिराओं में रक्त की जगह बैचेनियाँ दौड़ने लगती हैं तब कहीं जाकर जन्म लेती है एक अदद कविता....
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शेफाली पाण्डे
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[30 Apr 2010 08:40 AM]



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