सुवासित वक़्त
पतझड़ में गिरे शब्द फिर से उग आए हैं पूरे दरख़्त भर जायेंगेफिर मैं लिखूंगी पतझड़ और बसंत शब्दों के तो आते-जाते ही रहते हैंजब सबकुछ वीरान होता हैतो सोच भी वीरान हो जाती हैसिसकियों के बीच बहते आंसुओं सेकोंपले कब फूट पड़ती हैंपता भी नहीं चलतामन की दरख्तों...
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रश्मि प्रभा...
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[30 Apr 2010 07:57 AM]



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