कहां है लोक......
उमेश चतुर्वेदीलोक के बिना जिंदगी के रसधार की कल्पना नहीं की जा सकती। रोजाना की जिंदगी की टीस और उससे उपजी पीड़ा को स्वर देने का काम लोक की अपनी भाषा और उसका अपना साहित्य ही दे सकता है। लोक के दर्द की टीस को लोकसाहित्य इतनी खूबसूरती से अभिव्यक्ति देता है...
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उमेश चतुर्वेदी
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[30 Apr 2010 01:42 AM]



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