सामाजिक रिशतें

कसौंधन दर्पण मन में फिर फूल खिलने लगे है,आशाओं के दीप फिर जलने लगें है । आसमान में पहले दिखती थी कालीमा, अब रूपहले इन्‍द्र धनुष से बनने लगें है ।। मुस्‍कान से भी पहले जो करते थे नफरत, दिल खोलकर हँसने लगें है । कटे-कटे से रहना जिनकी थी आदत, अब दौडकर गले मिलने लगें है... [पूरी पोस्ट]
writer बृजेन्‍द्र कुमार गुप्‍ता
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[29 Apr 2010 22:34 PM]

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