सामाजिक रिशतें
मन में फिर फूल खिलने लगे है,आशाओं के दीप फिर जलने लगें है । आसमान में पहले दिखती थी कालीमा, अब रूपहले इन्द्र धनुष से बनने लगें है ।। मुस्कान से भी पहले जो करते थे नफरत, दिल खोलकर हँसने लगें है । कटे-कटे से रहना जिनकी थी आदत, अब दौडकर गले मिलने लगें है...
[पूरी पोस्ट]
बृजेन्द्र कुमार गुप्ता
16
3
0
3
7
[29 Apr 2010 22:34 PM]



Shuffle








