..........है भी नहीं भी
ग़ज़ल के चंद अश’आर पेश ए ख़िदमत हैं ,मालूम नहीं आप सब की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे भी या नहीं,आप सब की सलाहों और इस्लाहों का इन्तेज़ार रहेगा ,शुक्रियाग़ज़ल -----------------------गर प्यार न हो तो, ये जहां है भी नहीं भीहोंगे न मकीं गर,तो मकां है भी...
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इस्मत ज़ैदी
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[29 Apr 2010 15:19 PM]



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