रासलीला : संजीव 'सलिल'
रासलीला :संजीव 'सलिल' *आँख में सपने सुनहरे झूलते हैं. रूप लख भँवरे स्वयं को भूलते हैं.झूमती लट नर्तकी सी डोलती है.फिजा में रस फागुनी चुप घोलती है.कपोलों की लालिमा प्राची हुई है.कुन्तलों की कालिमा नागिन मुई है.अधर शतदल पाँखुरी से रसभरे हैं.नासिका...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
samyik hindi kavita
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[29 Apr 2010 11:40 AM]



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