मेलन्काली
पता नहीं कब से .....पर एकांत में अब रहा नहीं जाता। नि:शब्दता की स्थिरता से घबराता है मन। लगता है कहीं यूँ ही जड़ ना हो जाए। जाने अनजाने कितने ही शोर की आड़ में बैठती हूँ। इस शोर में भी अक्सर आवाज़ सुनाई देती है। आवाज़ जो मैं सुनना नहीं चाहती। बहुत धीमी...
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Beji
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[29 Apr 2010 09:53 AM]



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